सोमवार, 25 अप्रैल 2011

कविता : मन

       मन

उड़ता कभी पंख लगा कर
कभी  बैठ जाता सिमट कर
अपने से स्वयं को छिपाता
भरी भीड़ में खो जाता मन

रोता कभी  बच्चो की तरह 
खिलखिला फिर पड़ता है
पंखुड़ी सा कोमल मन 
सिहर सिहर जाता है 

नदी की तरह बहता है
बंध जाता अचानक मन
किसी अनजाने घाट से 
नयी सुबह के इंतजार में

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      चंद्रलेखा 

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